क्या MSP की गारंटी देना मुमकिन है? आखिर दिक्कत कहां आ रही है, जानें सबकुछ – farmer protest news update is it possible to guarantee msp


हरवीर सिंह : किसानों का मौजूदा आंदोलन 2020-21 वाले आंदोलन से थोड़ा अलग है। तब आंदोलन केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ था। आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर, 2021 में खुद उन कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी।रिपोर्ट का इंतजार : किसान वापसी के लिए तब तैयार हुए थे, जब केंद्रीय कृषि सचिव ने पत्र लिखकर कहा कि हम आपकी दूसरी मांगों पर विचार करेंगे और समिति बनाएंगे। समिति जुलाई, 2022 में बनी, जिसकी पहली मीटिंग अगस्त, 2022 में हुई। उसमें करीब 40 सदस्य थे। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा उसमें शामिल नहीं हुआ, क्योंकि समिति के अध्यक्ष कृषि सचिव रहे संजय अग्रवाल बने, जो कृषि कानून बनने के वक्त खुद कृषि सचिव थे। अभी तक उस समिति की रिपोर्ट नहीं आई है।

वार्ता बेनतीजा : अभी का आंदोलन किसानों के एक ऐसे वर्ग का है, जो संयुक्त मोर्चा में नहीं था। इस वर्ग ने कहा कि हम दिल्ली जाकर सरकार पर दबाव बनाएंगे कि वह MSP की गारंटी दे और उसे तय करने के लिए सी-2 लागत प्लस पचास फीसदी के फॉर्म्युले को आधार बनाए। दोबारा दिल्ली आने को तैयार इन किसानों की अब तक सरकार के साथ चार दौर की वार्ता हो चुकी है, जिनमें कोई हल नहीं निकला है।

छोटे किसान बेहाल : अब आंदोलन तो खड़ा हो गया। किसानों के अन्य मोर्चे भी धीरे-धीरे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके साथ जुड़ते जा रहे हैं। यहां एक बड़ा पक्ष यह है कि पिछले किसान आंदोलन से देश भर के किसानों में MSP को लेकर एक अवेयरनेस आई। हमने खुद पांच राज्यों में करीब साढ़े छह सौ किसानों से बातचीत की। जोधपुर, मुजफ्फरनगर, कोयंबटूर, भुवनेश्वर और शिलांग में एक सुर में किसानों ने कहा कि उन्हें गारंटी सहित MSP चाहिए। यह सरकार भी मानती है कि छोटे और मंझले किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव तो है ही, गेहूं, चावल, गन्ना छोड़ दें तो बाकी फसलों की सरकारी या प्राइवेट खरीद तय कीमत पर नहीं होती।

आय की असमानता: ऐसे तथ्य भी हैं कि जहां सरकारी खरीद ठीक होती है, मसलन पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश, वहां के किसानों की आय बाकियों से बेहतर है। इसलिए बाकी किसान भी चाहते हैं कि उन्हें सरकारी दाम मिले। दूसरा पहलू यह है कि जहां किसान पूरी तरह बाजार पर निर्भर हैं, वहां बेहतर दाम नहीं मिलते। बिहार में प्रभावी सरकारी खरीददारी नहीं होती, इसलिए वहां बहुत कम दाम मिलता है।
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बाहर का माल : सरकारी अधिकारी भी मानते हैं कि यूपी, बिहार से काफी सारा अनाज, खासतौर से धान बिकने के लिए हरियाणा-पंजाब की मंडियों में आ जाता है। अधिकारियों ने स्वीकार भी किया कि कई बार पंजाब-हरियाणा में उपज से भी ज्यादा खरीद होती है। इससे समझ सकते हैं कि अगर MSP पर फसलों की खरीद हो तो किसानों के लिए उसके क्या मायने हैं। पंजाब-हरियाणा के किसान की आय और बाकी की औसत आय का अंतर भी इसे ठीक से समझाता है।
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सरकारी दखल : एक पहलू यह है कि जिन 23 फसलों की MSP केंद्र सरकार तय करती है, उन सबकी खरीद उस पर क्यों नहीं होती? हालांकि जब कपास का दाम कम होता है तो कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया सरकार की तरफ से हस्तक्षेप करती है कि दाम ठीक हो जाएं। एक और विकल्प सामने आया। मध्य प्रदेश सरकार ने शिवराज सिंह चौहान के समय में एक भावांतर योजना लागू की थी कि अगर किसान MSP के नीचे दाम पर अपनी फसल बेचता है तो अंतर की भरपाई राज्य सरकार कर देगी। केंद्र सरकार ने भी एक योजना के तहत इसकी बात की थी और नीति आयोग भी इसका समर्थक है।
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बाजार में फसल: ऐसे में सवाल है कि क्या किसानों को 23 फसलों पर MSP की गारंटी दी जा सकती है? क्या यह व्यावहारिक है? सरकारी अधिकारी और अर्थविद कहते हैं कि सारे उत्पादों को खरीदना सरकार की राजकोषीय स्थिति के लिए मुश्किल पैदा कर देगा। हालांकि मैं उनके ऐसे आंकड़ों को बहुत तथ्यात्मक नहीं मानता। सवाल है कि जिन फसलों की MSP तय होती है, उनमें मार्केट सरप्लस कितना आता है। कपास या गन्ना जैसी व्यावसायिक फसलों को छोड़ दें तो 25 से 30 फीसदी तक खुद किसान अपने स्तर पर उपभोग करता है। माना जाता है कि 35-40 फीसदी से लेकर 60 फीसदी फसल ही बाजार में बिक्री के लिए आती है।
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आयात निर्भरता: सरकार राशन व्यवस्था के लिए धान-गेहूं की जो सरकारी खरीद करती है, उसमें करीब दो लाख करोड़ रुपये सबसिडी का स्तर आता है। हमारे देश में गेहूं का उत्पादन 10.9-11 करोड़ टन के आसपास है। 2022-23 का आकलन था कि घरेलू खपत 10.4 करोड़ टन है। ऐसे में हम कोई बहुत बड़े सरप्लस में नहीं है। चूंकि गेहूं का उत्पादन गिरा है, तो सरकार को निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा, स्टॉक लिमिट लगाई गई। चावल के निर्यात पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं।
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दालों का आयात: देश लगभग 35 लाख टन दालों का आयात करता है। तिलहन में भी हम आयात पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार अगर प्रोत्साहन देगी तो आयात पर निर्भरता कम होगी। मेरा मानना है कि कृषि को हमें नैशनल फूड सिक्यॉरिटी के चश्मे से देखना चाहिए। सरकार, क्रिटिक्स या उपभोक्ताओं को भी अपनी धारणा बदलनी चाहिए। उन्हें मानना चाहिए कि किसान खेती में बना रहे, उसकी अगली पीढ़ियां भी खेती करें, यह सबके लिए महत्वपूर्ण है।

व्यावहारिक पक्ष: अमेरिका जैसा देश अपनी सुरक्षा के बाद कृषि को तरजीह देता है, जबकि वहां सिर्फ 20 लाख जोत हैं। हमारे यहां तो अभी भी 13 से 14 करोड़ किसान खेती करते हैं। लेबर फोर्स सर्वे में 45 फीसदी लोगों को कृषि से रोजगार मिल रहा है। तो यह देखना पड़ेगा कि MSP की मांग को किस तरह से लागू किया जा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ कृषि पत्रकार हैं)



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